कोई समझे ज़रा…..बोली बेजुबानों की

कोई समझे ज़रा…..बोली बेजुबानों की

आसां नहीं होता यूँ, ज़िन्दगी से मुँह मोड़ना,

आसां नहीं होता यूँ, चलती साँसों को तोड़ना।

बहुत दर्द होता है, आखिरी साँस में ऐ रवि,

आसां नहीं होता यूँ, ज़िन्दगी जीना छोड़ना।।

ये चंद पंक्तियाँ ज़िन्दगी की अनमोलता को दर्शाते हुए, इसकी गहराई को समझा रही हैं। इनका एक एक शब्द अपने आप में हर साँस के दर्द को बयाँ कर रहा है। अच्छी हो या बुरी, जैसी भी हो अपनी और अपनों की ज़िन्दगी हमें बेहद प्यारी होती है। हम गिरते हैं, फिर सम्भलते हैं और कभी चोट खाते हैं तो कभी किस्मत से बच जाते हैं। लेकिन इस सब के बीच ज़िन्दगी एक पल भी थमती नहीं है। जब हमारे किसी अज़ीज को चोट लगती है तो, हमें बहुत दुख होता है। आप ऐसा महसूस करते हैं जैसे चोट उसने नहीं बल्कि आप ही ने खाई हो और उस पल आपको दर्द का एहसास भी होता है। अपने इस लगाव के कारण हम शायद ज़िन्दगी की कद्र करते हैं, लेकिन सिर्फ अपनी और अपनों की जिंदगी की।

कभी अपने आस-पास नज़र दौड़ाइए और ज़रा गौर से देखिए। ना जाने कितनी ही बदहाल ज़िंदगियाँ आपको अपने करीब नज़र आयेंगी। विडम्बना यह है कि या तो इन्हें देख कर आप स्वयं को अपने पास समय ना होने का बहाना देकर निकल जाते हैं या फिर इन्हें सिरे से नज़रन्दाज़ कर देते हैं। कभी अपने भीतर झाँककर खुद से ये सवाल करना कि, क्या सच में तुम उस पल इतने व्यस्त थे कि किसी की सहायता नहीं कर सकते थे? जवाब में अपने आप आपकी नज़रें अपने ही सामने शर्म से झुक जायेंगी।

यहां मैं गरीब और लाचार इंसानों की बात नहीं कर रहा, ये तो कम से कम अपनी समस्या हमें कहकर बता सकते हैं। यहाँ ज़िक्र हो रहा है प्राचीन काल से हमारे साथी रहे हमारे आस पास के मूक पशुओं का। हमारे आस-पास रोज़ाना कई पशुओं जैसे कुत्ते, बिल्ली, गाय, पक्षियों आदि का बेवजह शोषण किया जाता है, उन्हें मारा पीटा जाता है। एक बार सोचकर देखिये कि – क्या चोट लगने पर सिर्फ हमें ही दर्द होता है? क्या इन बेज़ुबानों पर इस तरह जुल्म करना सही है?

माना कि हम मानवों को विश्व की प्राणी व्यवस्था के शीर्ष पर विराजमान होने का अधिकार प्राप्त है, लेकिन हर बड़ी ताक़त के साथ बड़ी जिम्मेदारी का भार भी वहन करना होता है। इस बात को समझते हुए खुद को इन बेजुबानों पर खुला अत्याचार करने से रोकें।

ये बेचारे सब कुछ सहकर भी हमारे प्रति कितने वफादार रहते हैं। लगभग डेढ़ वर्ष पहले हैदराबाद में कुछ युवकों ने अपने आनंद के लिए कुत्ते के तीन बच्चों को जिंदा जला दिया, साथ ही अपनी इस घिनौनी करतूत का वीडियो भी बनाकर इंटरनेट पर डाल दिया। अगर आप इंटरनेट पर मौज़ूद एनिमल अब्यूज की घटनाओं पर गौर करेंगे तो विश्वभर से आपको भयावह आँकड़े प्राप्त होंगे।

भला इन बेजुबानों का कुसूर क्या है? ये तो आप पर अपना सारा प्यार निःस्वार्थ लुटा कर थोड़ा प्यार मांगते हैं। लेकिन इन्हें इनके हक़ का प्यार देने के बजाय अपने अंदर का क्रोध और घृणा इन पर निकालना इंसानियत को शर्मसार करने वाली हरकत है। कुछ लोग तो केवल अपने मनोरंजन के लिए इन मासूम जीवों की जान ले लेते हैं।

इन मूक जीवों पर होने वाले अत्याचार का एक बड़ा उदाहरण आपको बड़ी-बड़ी फल/सब्जी मण्डियों में देखने को मिल जायेगा। वहां भोजन की आस में इधर उधर भटक रहे बैल-गायों को अपनी दुकान से दूर भागने के लिए एसिड तक छिड़क देते हैं। एक मानव पर तेजाब फेंकना जितना बड़ा जुर्म है, इन मासूम जीवों पर तेजाब से हमला करना भी उतना ही संगीन अपराध है। इस प्रकार की घटनाओं पर कड़ी कार्यवाही होनी चाहिए।

मासूम जीव,बेजुबान जीव,जिंदगी

मासूम जीव,बेजुबान जीव,जिंदगी

वैश्विक स्तर पर अगर हम नज़र डालें तो ज्यादातर आबादी माँसाहारी है और इसके प्रति लोगों के अपने अपने मत हैं। मुद्दे की बात यह है कि कई देशों ने एनिमल अब्यूज की घटनाओं पर पाबन्दी लगाने के लिए कड़े कानून बनाये हैं। हमारे देश में भी पशुओं पर अत्याचार को एक जघन्य अपराध घोषित किया जाना चाहिए, क्योंकि जीने का जितना हक़ हम इंसानों को है उतना ही इन मासूमों को भी है। हम सभी को मिलकर बेजुबानों पर हो रहे इन अत्याचारों को रोकना चाहिए। ये भले ही बोल नहीं सकते, लेकिन संवेदना और भावनाओं के मामले में ये हमसे बहुत बेहतर हैं। इन जीवों की आँखों में नफरत व घृणा जैसी कोई भावनाएँ नहीं होती, केवल निश्छल प्यार और वफ़ा होती है। आओ हम इन बेजुबानों पर हो रहे जुल्मों को रोककर इन्हें भी जीने की स्वतन्त्रता दें। आओ हम इन बेजुबानों की आवाज़ बनकर इनके हक़ के लिए लड़ें और इन्हें वो प्यार दें जिसके ये हक़दार हैं।

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